Home जिज्ञासा रेडियो FM कैसे काम करता है

रेडियो FM कैसे काम करता है

यह थोड़ा तकनीकी है, मैं कोशिश करूंगा कि तकनीक आसान भाषा में आपको समझा पाऊं।

दर असल आवाज यानी ध्वनि तरंगों की अपनी कुछ सीमाएं हैं, वह अधिक दूरी तय नहीं कर सकती और दूसरा उसकी दूरी तय करने की गति भी बहुत धीमी है तो अधिक दूरी या सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करने में आवाज को बहुत समय लगेगा और समय के साथ साथ आवाज का क्षय भी होता है और आवाज धीरे धीरे दूरी के साथ-साथ कम भी होती चली जाती है।

इस समस्या के निदान के लिए रेडियो का अविष्कार हुआ मोटे तौर पर समझे तो रेडियो में इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगे जिन्हें बाद में रेडियो तरंगे भी कहा गया जो प्रकाश की गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचती हैं को माध्यम बनाकर आवाज को एक से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है।

रेडियो के प्रादुर्भाव के समय विकसित इस तकनीक में ध्वनि तरंगों के आयाम को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक या रेडियो तरंगों के आयाम यानी एंप्लीट्यूड (Amplitude) के साथ एक विशेष तकनीक से जिसे मॉड्यूलेशन कहा जाता है मिश्रित करके, एंटीना के माध्यम से प्रसारित किया जाता है, दूसरी ओर, इसी का उल्टा प्रयोजन कर रेडियो तरंगों से ध्वनि तरंगों को अलग कर लिया जाता है। इस पूरी विधि को एंप्लीट्यूड माड्यूलेशन (Amplitude Modulation) जिसे सामान्य भा षा में ए एम (AM) कहा जाता है।

इस तकनीक यानी AM में कुछ कमियां है, जिसकी वजह से, प्रसारित की गई आवाज़ यानी ध्वनि तरंगों की गुणवत्ता या क्वालिटी रेडियो पर कई कारकों की वजह से खराब हो जाती है।

इस समस्या से निजात पाने के लिए, एक नई तकनीक खोजी गई इस नई तकनीक में ध्वनि तरंगों के आयाम के बजाय इनकी आवृत्ति यानी फ्रीक्वेंसी (Frequency) को रेडियो तरंगों के साथ उसी प्रकार की किंतु उस तकनीक से कुछ अलग, एक विशेष तकनीक द्वारा मिश्रित किया गया क्योंकि इस तकनीक में ध्वनि तरंगों की आवृत्ति यानी फ्रीक्वेंसी को काम में लिया गया इसलिए इससे फ्रिकवेंसी माड्यूलेशन (Frequency Modulation) तकनीक या एफएम (FM) नाम दिया गया।

एफएम के माध्यम से प्रसारित ध्वनि बेहतर गुणवत्ता की होती है, इसलिए यह बेहद पॉपुलर तकनीक है। लेकिन, इस तकनीक में भी एक कमी है, ये तरंगें एक सीधी रेखा में गमन करती हैं, दूसरी ओर, पृथ्वी की सतह गोल होने के कारण, ये तरंगे बहुत ज्यादा दूरी तक नहीं जा पाती हैं, और अधिक दूरी तक आवाज़ को पहुंचाने के लिए, कई रिपीटर ट्रांसमीटर लगाने पढ़ते हैं, या एंटीना ज़्यादा ऊंचे बनाने पढ़ते हैं। इस कारण यह तकनीक महंगी हो जाती है।

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